"ममता का आंचल

ममता का आंचल"

हर किसी की जिंदगी में "मां" और उनके आंचल से जुड़े ढेर सारे किस्से होते ही होंगे , वैसे ही मेरी जिंदगी में भी ढेर सारे किस्से हैं , शायद उन्हें शब्दों में बयां कर पाना नामुमकिन सा लगता है। फिर भी मैं उनके आंचल से जुड़े कुछ खास किस्सों को आप सब से सांझा करना चाहती हूं,

बचपन में नींद न आने पर कभी - कभी 

उनका आंचल, मेरे लिए सोने का झूला बन जाता था 

जिसमें मैं चैन से,सो जाती थी, 

कभी उनका आंचल, मुझे तपती धूप 

और भारी बरसात से बचाने के लिए छतरी बन जाती थी, 

कभी मुझे पसीना आने पर उनका आंचल मेरे लिए रुमाल बन जाती थी , 

तो कभी मुझे ठंड लगने पर वह आंचल कंबल में बदल जाती थी 

और मुझे चोट लगने पर वही आंचल 

मेरी मरहम की पट्टी बन जाती थी।


अगर मैं कहते ही जाऊं तो ये किस्से कभी खत्म ही नहीं होंगे, 

पर पन्ने भर जाएंगे और इन किस्सों में, 

मैं खुद को ही भूला बैठूंगी।


आज मैं सोचती हूं तो हैरान हो जाती हूं, 

एक छोटा सा साड़ी का टुकड़ा मेरी हर ज़रूरतें पूरी करती थीं 

और मुझे हर मुसीबत से बचाती थी, 

कैसे? 


पर अब धीरे-धीरे मै समझने लगी हूं, 

वह सिर्फ एक साड़ी का टुकड़ा नहीं, वहां ममता का भंडार है, 

जिसके जरिए, 

मां अपना प्यार जताती थी हम पर।


पर यह कहना गलत नहीं होगा 

कि हम सब जन्म लेते ही मां के आंचल की ठंडी छाया में कुछ सालों तक रहते हैं,

जहां पर हम खुद को महफूज पाते हैं पर यह सारी बातें हमें याद ही नहीं रहती।


वक्त कितना भी आगे बढ़ जाए, 

पर आज भी, 

जब मैं अपने मां के आंचल में सर रखती हूं 

तो दिन भर की सारी थकान और परेशानियों को भूल 

बड़ा सुकून सा महसूस करती हूं।


जहां मैं फिर से एक छोटी सी बच्ची बन जाती हूं , 

और ढेर सारी कहानियां सुनती हूं 

अपने आज को भुलाकर,

फिर अगली सुबह एक नए जोश के साथ दिन की शुरुआत कर पाती हूं।


संजोए रखना चाहती हूं 

मां के साथ बिताए हुए हर पल को, 

पर कभी-कभी डर लगता है 

कहीं मैं खो न दूं इस ममता से भरे अनमोल आंचल को, 

क्योंकि यहीं से मुझे कुछ भी हासिल करने का जज्बा मिलता है 

और यही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। 


कभी-कभी कुछ किस्सों को व्यक्त करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं।

जब वह किस्से खासकर मां से जुड़े हुए हो... 

उन किस्सों को सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

शायद, आज मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, 

आज मैं फिर से उन सारे किस्सों को जी पा रही हूं, अपने लेखन के जरिए, 

और अब मेरा मन भावुक हो उठा है,


अंत में बस मैं इतना ही कहना चाहती हूं :

"तेरे आंचल के छांव में

यूं ही रहने दो मुझे,

तेरे रहने से बहार हैं मुझमें 

तेरे बिना सारी दुनिया सुनसान है ।


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लेखिका: गंगू (Gangu)